पुष्टिमार्गीय भक्ति संगीत : एक अवलोकन
Abstract
मनुष्य जीवन को उच्च गति व विकास पद पर ले जाने का प्रमुख साधन संगीत बना। जब तक संगीत का भक्ति स्वरूप समाज में उच्च स्थान पर रहा, तब तक धर्म भी उच्च आसन पर विराजमान रहा। परंतु इसके विपरीत जब संगीत का मुख्य उद्देश्य श्रृंगार वा विलासिता बन गया तभी से धर्म व समाज अपने उच्च आसन से च्युत होना आरंभ हो गया। तब केवल भक्ति संगीत के माध्यम से ही, धर्म की प्रतिष्ठा को बढ़ाकर, समाज को स्थिर रूप प्रदान किया गया।
भक्ति रस की इस धारा को संगीत में प्रवाहित करने का श्रेय सूर, तुलसी, कबीर तथा मीरा आदि गायक संतो को जाता है। श्रृंगार, वीर व करूंण आदि नव रसों के अतिरिक्त, भक्ति रस को स्वतंत्र रस के रूप में प्रतिस्थापित करने का श्रेय भी इन्हीं को है। मध्यकालीन दरबारी गायकों के द्वारा केवल श्रृंगार प्रधान व निरर्थक गीतों का प्रचार किया जाता था, उसके स्थान पर पं.भातखंडे तथा पंडित पलुस्कर जी ने सूर, तुलसी और मीरा आदि भक्तों के भजनों को विभिन्न रागों में बांधकर, नए आयाम का सृजन किया तथा शास्त्रीय संगीत को पावन एवं पवित्र दिशा की ओर उन्मुख किया।
उत्तर प्रदेश में तुलसी, राजस्थान में मीरा, बंगाल में चैतन्य, उड़ीसा में जयदेव, महाराष्ट्र में रामदास तथा गुजरात में नरसी आदि भक्तों ने अपने रसमय कीर्तनों के माध्यम से समस्त भारत देश को भक्ति विभोर करने का कार्य किया। सही मायने में, संगीत को समाज में उच्च स्थान दिलाने का श्रेय, ऐसी ही महान विभूतियों को जाता है। आज मथुरा तथा वृंदावन आदि कइ मंदिरों में ईश्वर की आराधना के लिए ध्रुपद व धमार आदि गायन शैलियों का प्रयोग किया जाता है। भक्ति संगीत शांत, गंभीर तथा प्रौढ़ प्रकृति का होता है। संक्षेप में भक्ति अथवा आध्यात्मिकता संगीत की आत्मा है और इसके अभाव में संगीत एक मलिन शरीर से अधिक और कुछ शेष नहीं रहता।
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