भारतीय संगीत में रागों की परिकल्पना
Abstract
प्राचीन काल में संगीत उपासना का मार्ग था, मोक्ष-प्राप्ति का सुगम साधन था। संगीत की साधना एक कठोर तपस्या के रूप में है, फिर भी यह अलौकिक सुख प्रदान करती है। यह जनरञ्जन होने के साथ-साथ भवभंजन भी है, परन्तु ऐतिहासिक एवं अन्यान्य कारणों से संगीत की मुक्तिदायिनी साधना का स्वरूप क्रमशः तिरोहित होता गया और जनरंजन पक्ष की प्रधानता होती गई। फलतः संगीत आज केवल मनोरंजन एवं धनोपार्जन का साधन मात्र बनकर रह गया है। संगीत का प्रभाव जड़ और चेतन दोनों पर ही पड़ता है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध कर दिया है और इसके पीछे भी संगीत में निहित वह रसानन्द की भूमिका स्पष्टतः परिलक्षित होती है। जैसा कि रस की परिभाषा में उद्धृत है, उसके अनुसार विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पोषित स्थायी भाव ही रस रूप में परिणत हो जाता है। संगीत में स्वर, राग, ताल, बंदिशें, समय, ऋतु, जहाँ रसानन्द की प्राप्ति में भरपूर मदद करते हैं वहीं रागाभाव के अनुकूल काव्य, शैली, बंदिशों के गढ़ने एवं कहन, कलाकार का मुद्राभाव, मंच-सज्जा, वातावरण एवं कलाकार के व्यक्तित्व जैसे महत्वपूर्ण तत्वों की उपादेयता को भी नकारा नहीं जा सकता है। उपर्युक्त सभी तत्व, शास्त्र एवं क्रियात्मक दोनों ही दृष्टि से सौंदर्य, रस एवं आनन्द की अनुभूति के लिये महत्वपूर्ण हैं।
References
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