संगीत व सौन्दर्यशास्त्र

Authors

  • डॉ मनीष डंगवाल एसोसिएट प्रोफेसर, संगीत विभाग, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गोपेश्वर, चमोली ,उत्तराखंड

Abstract

संगीत में प्रयुक्त ध्वनियां, विभिन्न मानसिक स्थितियों की भी सूचक होती है। यह केवल आनंदानुभूति ही नहीं होती, अपितु यह हमारे मनोभावों को भी प्रभावित करती हैं। संगीत हमारी आत्मा में भक्तिमय अनुभूतियां भर देता है तथा भक्ति भी एक प्रकार का आवेग है, जो हमारी आत्मा को प्रभावित करता है। यद्यपि स्थूल रूप से ललित कलाओं में भिन्नता स्पष्ट दिखाई देती है और है भी, परंतु एक धरातल ऐसा भी है जिस पर पहुंचकर सभी ललित कलाएं तात्विक दृष्टि से अंतःसंबंद्ध और सामान सिद्ध होती हैं इस प्रकार किसी एक कला के भाव को स्पष्ट करने के लिए अन्य कला का सहारा लेना अंतः संबंध का सूचक है। भारतीय ‘कला साहित्य’ के अंतर्गत राग-माला चित्रों के द्वारा हमें संगीत की राग रागिनियों का चित्रात्मक दर्शन मिलता है।‌ राग-माला के चित्रों में राग-रागिनी से संबंद्ध वातावरण,दृश्य,विषय,रस, कला और भाव आदि का ऐसा व्यंजन चित्र रहता है की चित्र को देखने मात्र से राग अथवा रागिनी के रूप,प्रकृति और समय आदि का पूर्ण ज्ञान हो जाता है। यहां संगीत कला जिन दृश्य,अदृश्य सूक्षमताओं का विवेचन ध्वनि तथा लाय के द्वारा करती है उन्हें चित्रकला रंगरेखाओं के द्वारा, मूर्ति कला आकृतियों के द्वारा, काव्य कला काव्य के द्वारा व्यक्त करती है।  अतः सौंदर्य शास्त्र केवल किसी एक क्षेत्र से नहीं अपितु सौंदर्य के संपूर्ण क्षेत्र से संबंधित है।

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Published

15-02-2022

How to Cite

डॉ मनीष डंगवाल. (2022). संगीत व सौन्दर्यशास्त्र. International Educational Applied Scientific Research Journal, 7(2). Retrieved from https://ieasrj.com/journals/index.php/ieasrj/article/view/627