वल्लभ संप्रदाय के घरानों का विश्लेषण

Authors

  • डॉ मनीष डंगवाल एसोसिएट प्रोफेसर, संगीत विभाग, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गोपेश्वर, चमोली ,उत्तराखंड

Abstract

वल्लभ सम्प्रदाय के विभिन्न घराने केवल धार्मिक संस्थाएँ नहीं हैं, बल्कि भारतीय संगीत, साहित्य और भक्ति संस्कृति के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। इनकी हवेली संगीत परंपरा, अष्टछाप कवियों की रचनाएँ, राग-आधारित सेवा-पद्धति तथा गुरु-शिष्य परंपरा ने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक विशिष्ट आध्यात्मिक और सांगीतिक आधार प्रदान किया। इनके तुलनात्मक अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि यद्यपि सभी घराने एक ही वैष्णव दर्शन से जुड़े हैं, फिर भी स्थानीय सांस्कृतिक प्रभावों के कारण उनकी संगीत-शैली और प्रस्तुति में विशिष्टता विकसित हुई है। आचार्य बल्लभ द्वारा स्थापित पुष्टिमार्ग संप्रदाय, सर्वप्रथम गोवर्धन के जतीपुरा से प्रारंभ हुआ। जहां श्रीनाथजी के, श्री विग्रह को स्थापित करके आचार्य श्री ने पुष्टि संप्रदाय की नींव रखी क्योंकि आचार्य वल्लभ की आज्ञानुसार सेव्य स्वरूपों की सेवा केवल आचार्य वंशजों को ही प्राप्त हो सकती थी,  अतः वल्लभाचार्य जी के पुत्रों से होते हुए यह परंपरा गोस्वामी विट्ठल नाथ जी के पास पहुंची। तत्पश्चात उनके सात पुत्रों को सात सेव्य स्वरूपों के रूप में यह परंपरा हस्तांतरित हो गई।

यही सात सेव्य स्वरूपों से बने सात ग्रह/घराने आज भी भक्ति कि उस अविरल धारा को बहा रहे हैं, जिसका आरंभ १५ वीं शताब्दी में आचार्य श्री वल्लभ द्वारा प्रारंभ हुआ था।

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Published

15-12-2023

How to Cite

डॉ मनीष डंगवाल. (2023). वल्लभ संप्रदाय के घरानों का विश्लेषण. International Educational Applied Scientific Research Journal, 8(12). Retrieved from https://ieasrj.com/journals/index.php/ieasrj/article/view/625