साहित्येतिहास लेखन में परम्परा का महत्व: डॉ. भरत कुमार
Keywords:
साहित्येतिहास, परम्परा, इतिहास, रूढ़ी, इतिहास लेखन, चित्तवृत्ति, हिंदीAbstract
साहित्येतिहास लेखन में परम्परा के महत्व को रेखांकित करना महत्वपूर्ण है। इस परिप्रेक्ष्य में पाश्चात्य विचारक टी.एस. इलियट के “परम्परा एवं निर्वेयक्तिकता के सिद्धान्त” के आधार पर हिंदी साहित्य में परम्परा एवं इतिहास लेखन पर प्रकाश डालने का प्रयास किया है। समाज, संस्कृति, भाषा एवं साहित्य में कोई निश्चित परंपरा नहीं होती बल्कि एक साथ कहीं परंपराएं के क्रियाशील होती है। सत्ताधारी वर्ग की परम्परा साहित्येतिहास की महान परम्पराएं बन जाती है तथा लघु परम्पराएं गौण हो जाती है। ऐसे में रामचन्द्र शुक्ल एवं हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्येतिहास में परम्पराओं की खोज एवं साहित्येतिहास लेखन की विचारधारा को स्पष्ट किया गया है। इसके साथ ही लघु परम्पराओं में अपने लिए महान परम्पराओं की श्रृंखला खोजने का प्रयास हिंदी साहित्य में दलित, स्त्री, आदिवासी लेखकों ने किया है।
साहित्येतिहासकार द्वारा परंपरा और रूढ़ी को पहचान कर भेद को परिभाषित करना चाहिए। कई बार रुढ़ियो और परंपरा में भेद न करने के कारण महान प्रतिभाएं साहित्येतिहास से ओझल हो जाती है। महान प्रतिभाएं पुरानी रुढ़ियों को तोड़कर नई परंपराओं का सृजन भी करती है। प्रत्येक नई परम्परा के निर्माण में नयी रचनाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी होती है। उदाहरण के तौर पर बंगाल में माइकल मधुसूदन दत्त ने ‘मेघनाथ वध’ की रचना कर ‘राम कथा’ के पुराने अर्थ को बदल कर रख दिया। हिंदी साहित्य में भी सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने ‘राम की शक्ति पूजा’ के आधार पर रामकथा को नवीन अर्थ प्रदान किया।
आलेख में इतिहास लेखन, परम्परा एवं नवीन रचनाओं के आगमन के साथ ही पुरानी परम्पराओं के स्थान पर नव परम्परा निर्माण की रुपरेखा पर विचार किया गया है।
References
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XI. साहित्य और इतिहासदृष्टि: मैनेजर पाण्डेय, पृ: 197 मैनेजर पाण्डेय, पृष्ठ: 119, वाणी प्रकाशन, दिल्ली 2011
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