संगीतोपनिषद् सारोद्धार में वर्णित संगीत सिद्धांतों की वर्तमान समय में उपयोगिता

Authors

  • Dr. Umesh Kumar Assistant Professor (Guest Faculty), Department of Music Panjab University Chandigarh

Keywords:

संगीतोपनिषद् सारोद्धार, सुधाकलश, भारतीय संगीत, राग, ताल, वाद्य, नृत्य

Abstract

भारतीय संगीत परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन सांगीतिक परंपराओं में से एक है। इस परंपरा को व्यवस्थित रूप देने में विविध  शास्त्र ग्रंथों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मध्यकालीन संगीत ग्रंथों में संगीतोपनिषद् सारोद्धार का विशिष्ट स्थान है। इस ग्रंथ की रचना लगभग 1340 ईस्वी में पंडित सुधाकलश जी  द्वारा की गई,  इसमें संगीत के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक दोनों पक्षों का क्रमबद्ध वर्णन प्राप्त  है। ग्रंथ के छह अध्याय—गीत प्रकाशन, ताल प्रकाशन, राग प्रकाशन, वाद्य प्रकाशन, नृत्य प्रकाशन तथा नृत्य पद्धति प्रकाशन—भारतीय संगीत के विभिन्न आयामों को स्पष्ट करते हैं। वर्तमान समय में भारतीय शास्त्रीय संगीत का अध्ययन केवल परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालयों, संगीत संस्थानों तथा शोध कार्यों में भी इन ग्रंथों का अध्ययन आवश्यक माना जाता है। प्रस्तुत शोध-पत्र में संगीतोपनिषद् सारोद्धार में वर्णित संगीत सिद्धांतों का अध्ययन करते हुए उनकी वर्तमान समय में उपयोगिता का विश्लेषण किया गया है।

References

I. डॉ. माया टाक, संगीत सम्पदा, 2002, पृ. 17–18।

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V. कमलेश शर्मा, मध्यकालीन प्रमुख संगीत ग्रंथों की वर्तमान प्रासंगिकता का अध्ययन (शोध प्रबंध) ईई

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Published

01-04-2026

How to Cite

Dr. Umesh Kumar. (2026). संगीतोपनिषद् सारोद्धार में वर्णित संगीत सिद्धांतों की वर्तमान समय में उपयोगिता. International Educational Applied Scientific Research Journal, 11(4). Retrieved from https://ieasrj.com/journals/index.php/ieasrj/article/view/629